Ahmed Faraz Poetry in Hindi, Faraz Urdu Shayari, Love, Sad Ghazals

Ahmed Faraz Ghazals in Hindi

बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये;
कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये;

करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला;
यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये;

मगर किसी ने हमें हमसफ़र नही जाना;
ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये;

अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए;
ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये;

गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नहीं हारा;
गिरफ़्ता दिल है मगर हौंसले भी अब के गये;

तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो ‘फ़राज़’;
इन आँधियों में तो प्यारे चिराग सब के गये।
~ Ahmad Faraz Ghazal


बुझी नज़र तो करिश्मे भी…

बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़-ओ-शब के गये;
कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये;

करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला;
यही है रस्म-ए-ज़माना तो हम भी अब के गये;

मगर किसी ने हमे हमसफ़र नही जाना;
ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये;

अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिये;
ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये;

गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नही हारा;
गिरफ़्ता दिल हैं मगर हौसले भी अब के गये;

तुम अपनी शम-ए-तमन्ना को रो रहे हो ‘फ़राज़’;
इन आँधियों मे तो प्यार-ए-चिराग सब के गये।
~ Ahmad Faraz Ghazals


जो भी दुख याद न था…

जो भी दुख याद न था याद आया;
आज क्या जानिए क्या याद आया;

याद आया था बिछड़ना तेरा;
फिर नहीं याद कि क्या याद आया;

हाथ उठाए था कि दिल बैठ गया;
जाने क्या वक़्त-ए-दुआ याद आया;

जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल;
इक इक नक़्श तेरा याद आया;

ये मोहब्बत भी है क्या रोग ‘फ़राज़’;
जिसको भूले वो सदा याद आया।
~ Ahmad Faraz Ghazals


कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो…

कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो;
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो;

तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है;
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो;

नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं;
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो;

ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है;
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो;

तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है;
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
~ Ahmad Faraz Ghazals


करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे…

करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे;
गज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे;

वो ख़ार-ख़ार है शाख-ए-गुलाब की मानिंद;
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे;

ये लोग तज़किरे करते हैं अपने प्यारों के;
मैं किससे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे;

जो हमसफ़र सरे मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’;
अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे।


Ahmad Faraz Dard Shayari

जिसको भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’;
सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का।


Ahmad Faraz Gila Shikwa Shayari

दुनिया में मत ढूंढ नाम ए वफ़ा ‘फ़राज़’;
दिलों से खेलते हैं लोग बना के हमसफ़र अपना।


Ahmad Faraz Bewafa Shayari

किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ ‘फ़राज़’ कब तक;
जो तुम्हें भुला चुका है उसे तुम भी भूल जाओ।


Ahmad Faraz Dard Shayari

उसकी जफ़ाओं ने मुझे एक तहज़ीब सिखा दी है ‘फ़राज़’;
मैं रोते हुए सो जाता हूँ पर शिकवा नहीं करता।


Ahmad Faraz Ishq Shayari

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो;
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें;
अब न वो मैं हूं न तू है न वो माज़ी है ‘फ़राज़’
जैसे दो साये तमन्‍ना के सराबों में मिलें।

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